(१)
निशा व्यतीत हो चुकी कब की !
सूर्य किरण कब फूटी!
चहल-पहल हो उठी जगत में,
नींद न तेरी टूटी!
(२)
उठा उठा कर हार गई मैं,
आँख न तूने खोली,
क्या तेरे जीवन-अभिनय की
सारी लीला हो ली ?
(३)
जीवन का तो चिन्ह यही है
सो कर फिर जग जाना,
क्या अनंत निद्रा में सोना
नहीं मृत्यु का आना ?
(४)
तुझे न उठता देख मुझे है
बार बार भ्रम होता--
क्या मैं कोई मृत शरीर को
समझ रही हूँ सोता !