(१) निशा व्यतीत हो चुकी कब की ! सूर्य किरण कब फूटी! चहल-पहल हो उठी जगत में, नींद ...
(१) भूल तब जाता दुख अनन्त, निराशा पतझड़ का हो अन्त हृदय में छाता पुन: वसन्त, दमक उ...
(१) घर से यह सोच उठी थी उपहार उन्हें मैं दूँगी, करके प्रसन्न मन उनका उनकी शुभ आशि...
मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ; कर दिया कि...