(१) निशा व्यतीत हो चुकी कब की ! सूर्य किरण कब फूटी! चहल-पहल हो उठी जगत में, नींद न तेरी टूटी! (२) उठा ...
(१) भूल तब जाता दुख अनन्त, निराशा पतझड़ का हो अन्त हृदय में छाता पुन: वसन्त, दमक उठता मेरा मुख म्लान देवि ...
(१) घर से यह सोच उठी थी उपहार उन्हें मैं दूँगी, करके प्रसन्न मन उनका उनकी शुभ आशिष लूँगी । (२) पर जब उ...
मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ; कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर म...
সার্থক জনম আমার জন্মেছি এই দেশে, সার্থক জনম, মা গো, তোমায় ভালোবেসে। জানিনে তোর ধনরতন আছে কি না রানীর মতন, শ...